शॉर्ट सेलिंग एक ट्रेडिंग रणनीति है जिसमें निवेशक या ट्रेडर किसी स्टॉक या सिक्योरिटी को उधार लेकर उसे तुरंत बाजार में बेच देता है, यह उम्मीद करते हुए कि उसकी कीमत भविष्य में गिर जाएगी। बाद में जब कीमत गिर जाती है, तो वह उसी स्टॉक को कम कीमत पर वापस खरीद कर, उसे अपने ब्रोकर को लौटाता है और कीमत के अंतर से लाभ कमाता है। इसे आसान भाषा में "पहले बेचो, बाद में खरीदो" की रणनीति कहा जा सकता है।
शॉर्ट सेलिंग कैसे काम करती है?
सबसे पहले, ट्रेडर ब्रोकर से स्टॉक उधार लेता है।
उसे तुरंत वर्तमान बाजार मूल्य पर बेच देता है।
जब स्टॉक की कीमत गिर जाती है, तो वह कम कीमत पर उसी स्टॉक को खरीदता है।
फिर वह उधार लिया गया स्टॉक ब्रोकर को वापस कर देता है।
इस प्रक्रिया में, जो कीमत का अंतर (बेचने और खरीदने का) होता है, वह ट्रेडर का लाभ होता है।
उदाहरण: यदि कोई स्टॉक ₹50 पर ट्रेड हो रहा है और एक ट्रेडर सोचता है कि इसकी कीमत घटेगी, तो वह 100 शेयर उधार लेकर ₹50 में बेच देता है। अगर बाद में कीमत गिरकर ₹40 हो जाती है, तो वह 100 शेयर ₹40 में खरीदकर वापस करता है और ₹10 x 100 = ₹1000 का लाभ कमाता है।
शॉर्ट सेलिंग के लाभ:
बाजार में कीमत गिरने पर भी लाभ कमाने का मौका मिलता है।
तेजी से प्रॉफिट हासिल करने के लिए उपयुक्त।
ट्रेडिंग में लिवरेज की सुविधा मिलती है।
शॉर्ट सेलिंग के जोखिम:
अगर स्टॉक की कीमत बढ़ जाए तो नुकसान अनंत हो सकता है।
निवेशक को उधार लिए गए शेयर समय पर वापस करने होते हैं।
यह एक जोखिम भरी रणनीति है और इसे अनुभवी ट्रेडर्स के लिए ही सुझाया जाता है।
शॉर्ट सेलिंग आमतौर पर तब होती है जब ट्रेडर्स या निवेशक मानते हैं कि स्टॉक की कीमत नीचे जाएगी। यह ट्रेडिंग विशेष रूप से मंदी के बाजार में उपयोगी होती है।
संक्षेप में, शॉर्ट सेलिंग एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें आप पहले स्टॉक को उच्च कीमत पर बेचकर और बाद में उसे कम कीमत पर फिर से खरीदकर मुनाफा कमाते हैं, लेकिन इसमें जोखिम भी अधिक होता है। यह निवेशकों और ट्रेडर्स के लिए एक महत्वपूर्ण टूल है जो बाजार के गिरते हुए दौर से भी लाभ कमाना चाहते हैं।
अगर आप शॉर्ट सेलिंग में निवेश करना चाहते हैं, तो इसे अच्छे से समझ लेना और अनुभव के साथ करना जरूरी है क्योंकि जोखिम अधिक होता है।
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