27 मार्च को हर वर्ष विश्व रंगमंच दिवस (World Theatre Day) मनाया जाता है। यह दिन विश्व स्तर पर रंगमंच (थिएटर) के महत्व, योगदान और इसकी सांस्कृतिक विरासत को सम्मान देने के लिए समर्पित है। यह दिवस रंगमंच कलाकारों, लेखकों, निर्देशकों, संगीतकारों और सभी उन लोगों के लिए विशेष है जो नाट्यकला को जीवित रखते हैं।
विश्व रंगमंच दिवस का इतिहास:
विश्व रंगमंच दिवस की शुरुआत वर्ष 1961 में International Theatre Institute (ITI) द्वारा की गई थी। ITI की स्थापना यूनेस्को (UNESCO) द्वारा 1948 में की गई थी, और यह संस्था दुनियाभर में रंगमंच और प्रदर्शन कलाओं के विकास को बढ़ावा देने के लिए काम करती है।
1961 में, ITI के वियना सम्मेलन के दौरान यह प्रस्ताव रखा गया कि एक दिन को रंगमंच के नाम समर्पित किया जाए, ताकि इसके महत्व को वैश्विक स्तर पर पहचाना जा सके। इसके बाद से हर वर्ष 27 मार्च को यह दिवस मनाया जाता है।
इस दिन को मनाने का उद्देश्य न केवल रंगमंच के महत्व को उजागर करना है, बल्कि यह भी बताना है कि थिएटर कैसे समाज को जागरूक करता है, सामाजिक मुद्दों पर प्रकाश डालता है और लोगों के जीवन को संवेदनशीलता व रचनात्मकता से भरता है।
विश्व रंगमंच दिवस मनाने का उद्देश्य:
विश्व रंगमंच दिवस मनाने के कई उद्देश्य हैं, जिनमें प्रमुख हैं:
थिएटर की महत्ता को पहचान दिलाना: इस दिन के माध्यम से रंगमंच के सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व को उजागर किया जाता है।
कलाकारों को सम्मान देना: उन कलाकारों को सम्मानित करना जो थिएटर की दुनिया में काम कर रहे हैं, कभी-कभी सीमित संसाधनों के बावजूद भी।
नई पीढ़ी को प्रेरित करना: इस दिन कार्यक्रम आयोजित कर युवाओं को थिएटर से जोड़ने का प्रयास किया जाता है।
विश्वव्यापी जुड़ाव: थिएटर से जुड़े लोग विश्व भर में इस दिन एक-दूसरे के अनुभव साझा करते हैं और सांस्कृतिक आदान-प्रदान होता है।
इस दिन क्या होता है?
हर साल 27 मार्च को International Theatre Institute द्वारा एक प्रसिद्ध रंगकर्मी, लेखक, निर्देशक या कलाकार को संदेश (Message) लिखने के लिए आमंत्रित किया जाता है। यह संदेश पूरे विश्व में पढ़ा और साझा किया जाता है। यह परंपरा 1962 से शुरू हुई थी और तब से अब तक कई नामचीन हस्तियां यह संदेश दे चुकी हैं।
इस संदेश में थिएटर की भूमिका, उसकी चुनौतियों, सामाजिक प्रभाव और उसके भविष्य को लेकर विचार साझा किए जाते हैं।
इसके अलावा, भारत और विश्वभर में इस दिन विभिन्न नाट्य प्रस्तुतियाँ, वर्कशॉप, सेमिनार और प्रदर्शनियाँ आयोजित की जाती हैं। कला संस्थानों, थिएटर समूहों और सांस्कृतिक संगठनों द्वारा इस दिन विशेष कार्यक्रम होते हैं।
थिएटर और समाज:
रंगमंच सिर्फ मनोरंजन का माध्यम नहीं है, बल्कि यह समाज का दर्पण भी है। नाटक अक्सर समाज की समस्याओं, राजनीति, मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक अन्याय पर सवाल उठाते हैं। रंगमंच के माध्यम से:
सामाजिक संदेश प्रभावशाली ढंग से लोगों तक पहुँचता है।
लोगों में सहानुभूति और समझ की भावना बढ़ती है।
वंचित वर्गों की आवाज मंच पर जगह पाती है।
भारत में थिएटर की भूमिका:
भारत में थिएटर की परंपरा हजारों वर्षों पुरानी है। नाट्यशास्त्र जैसे ग्रंथ इसका प्रमाण हैं कि भारत में नाटक एक विकसित कला रूप था। कालिदास के नाटक, भक्ति आंदोलन के भक्तों के मंचन, पंडवानी, यक्षगान, नौटंकी और तमाशा जैसे लोकनाट्य रूपों ने भारतीय समाज को गहराई से प्रभावित किया है।
आधुनिक युग में भी हबीब तनवीर, गिरीश कर्नाड, विजय तेंडुलकर, और बिभाष चक्रवर्ती जैसे महान नाट्य कलाकारों ने थिएटर को नई ऊँचाइयाँ दीं।
युवा पीढ़ी और रंगमंच:
आज के डिजिटल युग में भी थिएटर की प्रासंगिकता बनी हुई है। जहाँ एक ओर लोग स्क्रीन पर वेब सीरीज और फिल्में देखना पसंद करते हैं, वहीं लाइव परफॉर्मेंस का अनुभव अभी भी लोगों को खींचता है। युवा पीढ़ी रंगमंच को एक सशक्त माध्यम के रूप में देख रही है — जहाँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, संवाद है, और कला का जिंदा रूप है।
निष्कर्ष:
27 मार्च को मनाया जाने वाला विश्व रंगमंच दिवस एक ऐसा अवसर है, जो हमें रंगमंच की गहराई, उसकी सामाजिक भूमिका और कलात्मक सौंदर्य की याद दिलाता है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि थिएटर केवल मंच पर होने वाली गतिविधि नहीं है, बल्कि यह जीवन के विविध रंगों, भावनाओं और संघर्षों का जीवंत प्रतिबिंब है।
इस दिन हमें न केवल थिएटर को सम्मान देना चाहिए, बल्कि हमें इसके संरक्षण और प्रचार-प्रसार के लिए भी काम करना चाहिए। नई पीढ़ी को थिएटर से जोड़ना और इसकी परंपरा को जीवित रखना हम सभी की ज़िम्मेदारी है। रंगमंच समाज को संवेदनशील बनाता है, संवाद सिखाता है और सृजनशीलता को निखारता है — इसलिए इसे जीवंत रखना अत्यंत आवश्यक है।
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