![]() |
| About internal medicine |
इंटरनल मेडिसिन का इतिहास
आंतरिक चिकित्सा का उद्भव यूरोप में 19वीं शताब्दी के अंत में हुआ था। यह शब्द लैटिन शब्द "internus" से लिया गया है, जिसका अर्थ है "भीतरी"। यह चिकित्सा की वह शाखा बनी जो रोगों की भीतरी जड़ों और कारणों को समझने पर जोर देती थी, न कि केवल लक्षणों को दबाने पर। समय के साथ यह आधुनिक चिकित्सा का आधार बन गई।
इंटरनल मेडिसिन का उद्देश्य
आंतरिक चिकित्सा का प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित है:
1. रोगों की पहचान और निदान: जटिल और बहु-प्रणाली रोगों का सही निदान करना।
2. दीर्घकालिक रोग प्रबंधन: मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, अस्थमा जैसी दीर्घकालिक बीमारियों का दीर्घकालीन प्रबंधन।
3. रोकथाम: जीवनशैली से संबंधित रोगों को रोकने के लिए नियमित परीक्षण और परामर्श।
4. प्राथमिक चिकित्सा देखभाल: रोगी की प्रारंभिक जांच, परीक्षण और उपचार।
इंटरनल मेडिसिन विशेषज्ञ की भूमिकाएँ
इंटर्निस्ट का कार्यक्षेत्र बहुत व्यापक होता है, जिसमें निम्नलिखित भूमिकाएँ आती हैं:
रोगों का समग्र मूल्यांकन करना: जैसे अगर किसी मरीज को बुखार, खांसी, कमजोरी और वजन घटना हो रहा हो, तो उसके पीछे संभावित कारणों की तलाश करना (जैसे टीबी, कैंसर, वायरल संक्रमण)।
प्राकृतिक चिकित्सा निर्णय: कौन-सा टेस्ट जरूरी है, कौन-सी दवाएं उपयुक्त होंगी, कब स्पेशलिस्ट को रेफर करना है – ये सभी निर्णय लेना।
बहु-अंग प्रणाली रोगों का इलाज: जैसे लूपस, रूमेटॉइड आर्थराइटिस, या मल्टीपल स्केलेरोसिस जैसे रोग।
पुरानी बीमारियों का प्रबंधन: जैसे डायबिटीज़, हृदय रोग, किडनी फेलियर आदि।
इंटरनल मेडिसिन और जनरल मेडिसिन में अंतर
विशेषता इंटरनल मेडिसिन जनरल मेडिसिन
फोकस वयस्कों की बीमारियाँ सभी आयु वर्ग की प्राथमिक बीमारियाँ
रोग की जटिलता जटिल और मल्टी-सिस्टम रोग सामान्य और प्राथमिक रोग
विशेषज्ञता अधिक विशिष्ट प्रशिक्षण सामान्य प्रशिक्षण
इंटरनल मेडिसिन की उप-विशेषताएँ (Sub-Specialties)
आंतरिक चिकित्सा के अंतर्गत कई उप-विशेषताएँ होती हैं:
1. कार्डियोलॉजी (हृदय रोग विज्ञान): हृदय और रक्त वाहिकाओं के रोग।
2. पल्मोनोलॉजी (फेफड़े रोग): अस्थमा, टीबी, ब्रोंकाइटिस, COPD आदि।
3. नेफ्रोलॉजी (गुर्दा रोग): किडनी फेलियर, डायलिसिस, आदि।
4. एंडोक्राइनोलॉजी: डायबिटीज़, थायरॉइड, हॉर्मोन असंतुलन।
5. गैस्ट्रोएंटेरोलॉजी: पेट, आंत, लिवर और पाचन से जुड़ी बीमारियाँ।
6. रूमेटोलॉजी: गठिया, ऑटोइम्यून रोग।
7. हेमेटोलॉजी: रक्त संबंधी रोग जैसे एनीमिया, ल्यूकीमिया।
8. संक्रामक रोग: HIV/AIDS, डेंगू, मलेरिया, हेपेटाइटिस आदि।
इंटरनल मेडिसिन में पढ़ाई और प्रशिक्षण
आंतरिक चिकित्सा विशेषज्ञ बनने के लिए निम्नलिखित शैक्षणिक मार्ग होता है:
1. MBBS (स्नातक चिकित्सा डिग्री): 5.5 वर्ष
2. MD इन इंटरनल मेडिसिन (स्नातकोत्तर): 3 वर्ष
3. फैलोशिप या DM (Super-Specialization, वैकल्पिक): 2-3 वर्ष
इस दौरान छात्रों को क्लिनिकल प्रशिक्षण, केस स्टडी, रिसर्च, और रोगियों की देखभाल में अनुभव दिया जाता है।
इंटरनल मेडिसिन विशेषज्ञ की कार्यस्थली
सरकारी या निजी अस्पताल
क्लिनिक या नर्सिंग होम
चिकित्सा कॉलेज और रिसर्च सेंटर
टेलीमेडिसिन और ऑनलाइन परामर्श सेवाएँ
सार्वजनिक स्वास्थ्य संगठन
आंतरिक चिकित्सा का महत्व
जटिल रोगों में विशेषज्ञता: जब रोगी को कई लक्षण होते हैं, पर निदान स्पष्ट नहीं होता, तब इंटर्निस्ट ही बीमारी की जड़ तक पहुंचता है।
रोकथाम और जागरूकता: हेल्थ चेकअप, वैक्सीनेशन, डाइट और जीवनशैली में सुधार।
संपूर्ण चिकित्सा देखभाल: रोगी के शरीर को एक संपूर्ण इकाई मानकर इलाज करना।
चुनौतियाँ और अवसर
चुनौतियाँ:
जटिल रोगों का प्रबंधन कठिन हो सकता है।
मानसिक तनाव, लंबे कार्य घंटे।
तेजी से बदलती चिकित्सा तकनीक को सीखते रहना।
अवसर:
उच्च प्रतिष्ठा और सम्मान।
रिसर्च और शिक्षण में योगदान।
सुपर-स्पेशलाइजेशन के अनेक विकल्प।
निष्कर्ष
इंटरनल मेडिसिन आधुनिक चिकित्सा का एक अत्यंत आवश्यक स्तंभ है। यह वह शाखा है जो मरीज को केवल उसके रोग के अनुसार नहीं, बल्कि एक संपूर्ण मानव के रूप में देखती है। इंटर्निस्ट विभिन्न प्रकार की बीमारियों को गहराई से समझते हैं, उनका विश्लेषण करते हैं और उनका प्रभावी उपचार करते हैं। बदलते समय और जीवनशैली के साथ, आंतरिक चिकित्सा की प्रासंगिकता और भी बढ़ती जा रही है। यदि आप चिकित्सा के क्षेत्र में करियर बनाना चाहते हैं, और रोगियों के साथ गहराई से जुड़कर उनके जीवन की गुणवत्ता सुधारना चाहते हैं, तो इंटरनल मेडिसिन आपके लिए एक उत्कृष्ट विकल्प है।

0 Comments