FII का फुल फॉर्म है Foreign Institutional Investor यानी विदेशी संस्थागत निवेशक। ये ऐसे संस्थागत निवेशक, कंपनियां या फंड्स होते हैं, जो अपने देश के बाहर किसी दूसरे देश के शेयर बाजार या अन्य वित्तीय साधनों में निवेश करते हैं। उदाहरण के लिए अगर कोई अमेरिका की म्यूचुअल फंड कंपनी भारत के शेयर बाजार में निवेश करती है, तो उसे FII कहा जाएगा।
FII कैसे काम करता है?
पंजीकरण: भारत में FII को निवेश करने के लिए सबसे पहले SEBI (भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड) के साथ रजिस्टर होना पड़ता है।
निवेश प्रक्रिया: FII स्टॉक्स, बॉन्ड्स, आईपीओ और अन्य वित्तीय इंस्ट्रूमेंट्स में निवेश कर सकते हैं। वे आम तौर पर शॉर्ट-टू-मीडियम-टर्म पर्सपेक्टिव से निवेश करते हैं।
नियमन एवं सीमा: RBI और SEBI, भारतीय बाजार में FIIs की हिस्सेदारी व निवेश सीमा निर्धारित करते हैं। भारत में एक FII किसी एक कंपनी में उसकी कुल पेड-अप कैपिटल का अधिकतम 24% तक ही निवेश कर सकता है (कुछ मामलों में शेयरधारकों की अनुमति से यह सीमा 30% तक भी बढ़ सकती है)। पब्लिक सेक्टर बैंक्स में यह सीमा 20% है।
मार्केट पर प्रभाव: FII जब बड़ी मात्रा में निवेश या निकासी करते हैं, तो इससे शेयर बाजार में लिक्विडिटी, वॉल्यूम व उतार-चढ़ाव (वोलाटिलिटी) बढ़ती है। इससे पूरे मार्केट के मूवमेंट पर असर पड़ता है।
भारत में FII के प्रमुख प्रकार
हेज फंड
सॉवरेन वेल्थ फंड
फॉरेन म्यूचुअल फंड
पेंशन फंड
ट्रस्ट/एसेट मैनेजमेंट कंपनियां
यूनिवर्सिटी एंडोमेंट फंड
ये सब मार्केट को कैपिटल व एक्सपर्टीज़ प्रदान करते हैं
FII के फायदे
बाजार में लिक्विडिटी बढ़ाना
अंतरराष्ट्रीय पूंजी का प्रवाह
कंपनियों की ग्रोथ और एक्सपेंशन के लिए पूंजी उपलब्ध कराना
मार्केट रिसर्च, जानकारी व नए इन्वेस्टमेंट टूल्स लाना
FII के नुकसान/चुनौतियां
अचानक बड़ी मात्रा में निवेश बाहर निकालने पर मार्केट में तेज गिरावट आ सकती है
वोलाटिलिटी बढ़ जाती है, जिससे छोटे निवेशकों को नुकसान हो सकता है
महत्वपूर्ण बिंदु
FII निवेशक भारत के बाहर पंजीकृत होते हैं मगर यहां निवेश करते हैं।
सभी FII को SEBI के साथ रजिस्टर करना अनिवार्य है।
FII और DII (Domestic Institutional Investors) दोनों मार्केट के लिए जरूरी हैं, मगर FII विदेशी निवेश का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि DII देश के भीतर का।
इस तरह FII भारतीय शेयर व वित्तीय बाजार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो बाजार को फंड, एक्सपर्टीज़, वॉल्यूम और वोलाटिलिटी प्रदान करता है।
भारत में विदेशी निवेशकों के लिए नियम मुख्य रूप से FDI (प्रत्यक्ष विदेशी निवेश) और FPI/FII (विदेशी पोर्टफोलियो निवेश) के तहत नियंत्रित होते हैं। इनके प्रमुख नियम निम्न हैं:
FDI नियम:
भारत में विदेशी निवेश को दो रूट से अनुमति मिलती है:
स्वचालित रूट: जहां विदेशी निवेशक को RBI या सरकार से पूर्व अनुमति लेना जरूरी नहीं होता, बस निवेश के बाद सूचना देनी होती है।
सरकारी अनुमोदन रूट: जहां निवेश के लिए संबंधित मंत्रालय या विभाग से अनुमति लेनी होती है।
कुछ क्षेत्रों में FDI प्रतिबंधित होता है जैसे: परमाणु ऊर्जा उत्पादन, जुआ, रियल एस्टेट, लॉटरी, चिट फंड आदि।
भारत सरकार ने FDI नीति 2020 और विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (FEMA) के तहत FDI का नियमन किया है।
FDI के लिए वित्त, विनिर्माण, ऊर्जा, संचार जैसे प्रमुख क्षेत्रों में 100% तक विदेशी निवेश की अनुमति दी जा सकती है, लेकिन यह क्षेत्रों के नियमों पर निर्भर करता है।
भारत सरकार ने विदेशी निवेश नियमों को सरल बनाकर स्वचालित मार्ग के तहत कई लेनदेन को अनुमति दी है, जिससे निवेश और कारोबार सजग, आसान और तेजी से हो सके।
FII/FPI नियम:
विदेशी संस्थागत निवेशक (FII) को SEBI से पंजीकरण करना होता है।
FII सेकेंडरी मार्केट में शेयर खरीदते हैं और उनकी हिस्सेदारी की सीमाएं होती हैं। उदाहरण के लिए, प्रतिभूति रसीदों की श्रृंखला में FII का निवेश 49% तक हो सकता है, लेकिन किसी एकल FII का निवेश 10% से अधिक नहीं हो सकता।
RBI और SEBI FII निवेश पर निगरानी रखते हैं.
प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) मुख्य पहलू:
FDI निवेश से विदेशी निवेशक कंपनी के प्रबंधन में हिस्सा लेते हैं।
ग्रीन फील्ड निवेश (नई कंपनी स्थापित करना) और पोर्टफोलियो निवेश के अलावा कई तरीके से किया जा सकता है।
भारत सरकार ने सीमा साझा करने वाले देशों के लिए विशेष शर्तें रखी हैं, जैसे कि सीमा साझा करने वाले देशों के निवेशकों को भारत में निवेश के लिए सरकार की अनुमति लेना पड़ेगा.
यह नियम निवेश के रूप, क्षेत्र विशेष की अनुमति, स्वचालित या अनुमोदन रूट, और प्रतिबंधित क्षेत्रों के अनुसार निर्धारित होते हैं। इससे भारत में विदेशी निवेश को नियंत्रित और सुरक्षित बनाया जाता है ताकि आर्थिक विकास होगा और व्यापार के अवसर बढ़ेंगे।
0 Comments