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How to affect global indices in indian stock market

वैश्विक सूचकांक (Global Indices) वे मानक या बेंचमार्क होते हैं जो दुनियाभर के वित्तीय बाजारों के प्रदर्शन को मापते हैं। ये सूचकांक, किसी विशेष बाजार खंड या सम्पूर्ण बाजार में शामिल प्रमुख कंपनियों के शेयरों के समूह के प्रदर्शन का प्रतिनिधित्व करते हैं। इनका उपयोग निवेशक और विश्लेषक बाजार की स्थिति, आर्थिक रुझान और निवेशकों की भावनाओं को समझने के लिए करते हैं।

वैश्विक सूचकांक निवेशकों को समग्र बाजार के प्रदर्शन का त्वरित अवलोकन प्रदान करते हैं और उन्हें अपने निवेश के प्रदर्शन की तुलना व्यापक बाजार से करने में मदद करते हैं। उदाहरण के लिए, डाउ जोन्स, एस एंड पी 500, नैस्डैक, एफटीएसई 100, निक्केई 225 आदि प्रमुख वैश्विक सूचकांक हैं।

भारतीय शेयर बाजार में वैश्विक सूचकांकों को प्रभावित करने के तरीके
भारतीय शेयर बाजार को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करना, जैसे वैश्विक सूचकांक (Dow Jones, Nasdaq, FTSE) की दिशा बदलना या वैश्विक निवेश प्रवाह को बदलना, सामान्य निवेशकों के लिए संभव नहीं है। लेकिन विविध आर्थिक, मौद्रिक, और नीतिगत कदमों से भारतीय बाजार की प्रतिक्रिया को तेज किया जा सकता है, जिससे वैश्विक निवेशक भारत की ओर आकर्षित हो सकते हैं और अप्रत्यक्ष रूप से वैश्विक सूचकांकों में भारतीय शेयर या निवेश का महत्व बढ़ सकता है.

कैसे प्रभावित किया जा सकता है:
अर्थव्यवस्था की मजबूती: भारत के भीतर आर्थिक सुधार, बढ़ती विकास दर, और स्थिर शासन वैश्विक निवेशकों का ध्यान आकर्षित करते हैं। इससे FPI/FII फ्लो बढ़ता है और भारतीय इंडेक्स का वैश्विक आकर्षण बढ़ता है।

सरकारी नीतियाँ एवं विनियम: व्यापार और निवेश के लिए आकर्षक नीति बनाकर विदेशी निवेश को आमंत्रित किया जा सकता है।

नवाचार और वैश्विक साझेदारी: उच्च तकनीक, IT एवं फार्मा जैसे सेक्टरों में नवाचार एवं वैश्विक कंपनियों से साझेदारी भारत को विदेशी निवेश के लिए हॉटस्पॉट बनाती है, जिसका असर स्थानीय और वैश्विक इंडेक्स पर होता है।

एफपीआई और एफआईआई प्रवाह: विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) और विदेशी संस्थागत निवेश (FII) बढ़ने से भारतीय शेयरों में निवेश बढ़ता है, जिससे निफ्टी/सेंसेक्स जैसे इंडेक्स मजबूत होते हैं और इनके वैश्विक सूचकांकों में योगदान भी बढ़ता है।

व्यापारिक नीति और भू-राजनीति: भारत के अंतरराष्ट्रीय संबंध, व्यापार समझौते, और वैश्विक घटनाओं (जैसे, अमेरिका-चीन ट्रेड वार) का प्रभाव भी वैश्विक सूचकांकों पर असर डालता है।

लिक्विड फंड से जुड़े जोखिम
ब्याज दर जोखिम: अगर मार्केट में ब्याज दरें बदलती हैं, तो NAV (यानी यूनिट की कीमत) पर थोड़ा सा असर आ सकता है। बहुत कम होता है, पर पूरी तरह से शून्य नहीं।

क्रेडिट रिस्क: अगर कंपनी या संस्था, जिसमें फंड का पैसा निवेश किया गया है, डिफॉल्ट कर जाए, तो नुकसान हो सकता है—हालांकि ये फंड केवल उच्च गुणवत्ता वाली इंस्ट्रूमेंट्स में ही निवेश करने का प्रयास करते हैं.

मार्केट रिस्क: बाजार में अचानक बड़े उतार-चढ़ाव (जैसे 2018 IL&FS संकट) के समय NAV गिर सकता है।

रिटर्न की गारंटी नहीं: लिक्विड फंड सुरक्षित हैं, लेकिन रिटर्न निश्चित नहीं—बाजार हालात, नकदी प्रवाह, और ब्याज दर पर निर्भर करता है.

सामान्य निष्कर्ष:
प्रत्यक्ष प्रभाव सीमित है, लेकिन यदि भारत खुद को वैश्विक निवेश के लिए आकर्षित करता है तो देश से जुड़े शेयर और इंडेक्स का महत्व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ सकता है।

वैश्विक निवेशक भारतीय शेयर मार्केट में मुख्य रूप से एफपीआई/एफआईआई के जरिये होते हैं, इनके प्रवाह में बदलाव से इंडेक्स के स्तर पर असर दिखता है।
आर्थिक सुधार, रिलायबल नीति, और वैश्विक साझेदारी ही सबसे बड़े साधन हैं।

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